आज फिर से एक और शाम हो चली है,
लेकिन किसके लिये?
बचपन तो भूल आया मैं कहीं और...
अब शाम नहीं सीधे रात हुआ करती है,
वो भी थकावट से भरी हुई रात ...
अब बातों में वो खनक नहीं रही,
बचपन वाली छनक नहीं रही,
हर चीज को जान लेने की तत्परता कहीं गायब हो गयी है,
लगता है मेरा बचपन अब जवानी के लायक हो गयी है...
खनखनाती हुई आवाज अब भारी हो गयी है,
शरारतों से भरी दिल की आलमारी अब खाली हो गयी है...
अब होंठों पर वो सच्चाई नहीं रही,
सबसे हँसते हुये मिलने की अच्छाई नहीं रही,
बड़ा बनने के कोशिश में निकल बहुत दूर आया हूँ,
बेवजह की खुशियों से भरा बचपन कहीं भूल आया हूँ...
©शिव प्रसाद शुक्ला
Thursday, 2 November 2017
बचपन
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