शिव प्रसाद शुक्ला
![]() |
| Image Source: Google Image |
![]() |
| Image Source: Google Image |
भारत में 'मी टू' कैंपेन की शुरुआत फ़िल्म
अभिनेत्री तनुश्री दत्ता ने की। उन्होंने फ़िल्म अभिनेता और सोशल एक्टिविस्ट नाना
पाटेकर के खिलाफ लैंगिक उत्पीड़न जैसा गंभीर आरोप लगाया और यह प्रकरण आग की तरह से
फैला जिसकी जद में कई नामी गिरामी हस्तियां भी आ गई। नाना पाटेकर, विकास बहल, आलोक नाथ, सुभाष कपूर, पियूष मिश्रा, चेतन भगत, अभिजीत भट्टाचार्य, कैलाश खेर, साजिद खान, सुभाष घई समेत यहां तक कि पत्रकारिता से राजनीति में आए
मोदी सरकार में कैबिनेट मंत्री एमजे अकबर का भी नाम इस मी टू कैंपेन में आया। अब
सवाल यह उठता है कि भारत जैसे देश में 'मी टू' कैंपेन के मायने क्या है? इसकी आवश्यकता क्यों पड़ी? और इसके परिणाम क्या होंगे या हो रहे हैं?
देवी लक्ष्मी, दुर्गा, सरस्वती, पार्वती, व माता सीता के देश भारत
में आए दिन हर रोज महिलाओं से बलात्कार व यौन हिंसा की खबरें आती हैं। प्रतिदिन,
प्रति घंटा, प्रति सेकंड कहीं ना कहीं
सड़क पर चलती हुई लड़कियों को घूरा जाता है, उन पर फब्तियां कसी जाती हैं। विद्यालय जाती हुई छात्राओं का पीछा किया जाता
है। रेल बस में यात्रा कर रही स्त्रियों/लड़कियों/छात्राओं से धक्का-मुक्की व
बदसलूकी किया जाता है। यह सब होता है हर रोज खुलेआम और फिर भारत माता का सिर शर्म
से झुक जाता है। वास्तव में यह विचारणीय है कि जहां एक तरफ हम स्त्रियों पर
आदर्शवाद की बड़ी-बड़ी बातें करते हैं वहीं दूसरी तरफ स्त्रियों को हम भोग व
विलासिता का साधन मात्र मानते हैं और उनके साथ घिनौने कृत्य करते हैं। वास्तव में
हमारा समाज व देश मानसिक रूप से बीमार होता जा रहा रहा है । वह अपने मूल्यों,
संस्कारों व नैतिक कर्तव्यों से दूर होता जा रहा है या यूं
कहें तो वह अपने मानसिक पतन की ओर अग्रसर है।
वर्तमान में भारत वह देश है जहां एक प्रधानमंत्री को बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ का नारा देना पड़ता है, एक मुख्यमंत्री को एंटी रोमियो स्क्वायड टीम का गठन करना पड़ता है और एक बेटी को निर्भया बनना पड़ता है पड़ता है।
![]() |
| Image Source: Google Image |
![]() |
| Image Source: Google Image |
इस देश में बहुतायत लोग ऐसे हैं जो सिर्फ और सिर्फ किसी मौके के तलाश में रहते हैं कि कब उन्हें मौका मिले किसी दूसरे के जिंदगी को इवेंट बना देने का, किसी दूसरे के निजी मामलों को एक अभियान बनाकर अपना मतलब सिद्ध कर लेने का। महिलाओं को यह भी ध्यान रखना होगा कि उनकी सुरक्षा के लिए बने कानूनों का कोई अन्य व्यक्ति या महिला गलत इस्तेमाल या दुरुपयोग न कर पाए वरना महिलाओं व पुरुषों के बीच की सामाजिक खाई और बढ़ेगी। इसीलिए मैं फिर कहता हूं, हे भारत की महिलाओं! अपने आप को पहचानो! खुद पर भरोसा रखो! क्योंकि अब समय आ गया है बदलाव का। अपने पराक्रम और साहस भरे इतिहास से प्रेरणा लो! अपनी आवाज बुलंद करो! तुम्हें किसी अभियान की आवश्यकता नहीं है, तुम स्वयं में शक्ति स्वरूपा हो।





शानदार,सटीक,और समयोचित लेख। ध्यान इस बात पे देना होगा कि मी टू अभियान के साथ उन लोगो को भी जोड़ा जाए जो एक निम्न वर्ग से आते है। वरना अन्य अभियानों की तरह या भी बस न्यूज चैनलों के टीआरपी ही बढ़ाने के काम आएंगे।
ReplyDeleteधन्यवाद
Deleteबेहद सुंदर लेख है शुक्ला जी।
ReplyDeleteबढियाँ सामंजस्य बनाए हैं सभी पक्षों से।
साधुवाद।
धन्यवाद कप्तान साहब!!
Deleteबेहद सटीक विश्लेषण भाई शिव प्रसाद जी
ReplyDeleteधन्यवाद बड़े भैया श्री जगदम्बा सिंह जी
Deleteशानदार भईया बहुत ही सुंदर लेख।।।
ReplyDeleteधन्यवाद
DeleteShandaar bhaiya
ReplyDelete