अपने अद्भुद साहस व हौसले से माउंट एवरेस्ट फतह करने वाली प्रथम भारतीय दिव्यांग अरुणिमा सिन्हा जी को समर्पित-
चलो मुसाफ़िर! एक कहानी लिखतें हैं
इस नये सफ़र की नई रवानी लिखते है
मुश्किल है सफ़र तो क्या हुआ?
है मानुष कौन जिसको कभी भय न हुआ?
पथरीले राहों का घना अंधेरा
आँखों से तेरे झांक रहा
दूर से ही कठिनाई भाँपकर
भय से थरथर तू काँप रहा
एक पग भी न तुझसे धरा जा रहा
ये कैसी तेरी जवानी है?
रणभेरी सुनकर पीछे हटना
कायरों की निशानी है
तू आजाद, भगत, बोस की जवानी पढ़
रास्तों की परवाह किये बिना तू आगे बढ़
तू नजरें टिका अर्जुन की भाँति मछली की आँख पर
दृढ़ता तेरी खुद ले जाएगी मंजिल के द्वार तक
तू रख हौसला अरुणिमा जैसा
जीवन चक्र में ये विश्राम कैसा
साहस का दामन थामें जो नित आगे बढ़ते हैं
लिए हाँथ में तिरंगा एक पैर से हिमालय चढ़ते हैं
- शिव प्रसाद शुक्ला
- शिव प्रसाद शुक्ला
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