आजादी
सोचता हूँ की मुट्ठी में कैद कर लूँ सारी दुनियाँ
फिर ख़याल आता है...आजादी भी कोई चीज होती है...
वजूद
मेरा वजूद ही कलम के नोंक से डायरी के पन्नों को कुछ यूँ सताता है,
तरोताजा लिखने की कोशिश में हर रोज लिखता मिटाता है
भावनाएं
काश कोई ऐसा यंत्र होता...जिससे इंसान की भावनाओं की पहचान होती,
तो यूँहीं भटकना नही पड़ता शब्दों के तलाश में
सुकून
जरुरत से ज्यादा कुछ इस तरह बढ़ा ख्वाहिशों का किला,
की सारी जिंदगी गुजर गई कमाने में फिर भी न सुकून मिला
ज़िन्दगी
कि शोखियां बटोरोगे कहाँ तक चलते चलते...
ये जिन्दगी भी रूह का मसला है, तुम्हे आराम न आयेगा
हिमाकत
हिमाकत भी अजब चीज है,
कभी खुद के नशे में चूर तो कभी मशहूर कर देता है
गाँव
शख्शियत बनने शहर को आया,
मशरूफियत जो देखी मुहल्ले की...तो गाँव याद आ गया
माँ
करे जो माँ को परिभाषित ऐसी कोई किताब नही,
माँ वो है जिसके ममता का कोई हिसाब नही
देश
सौ बार कर दूँ मैं अपनी जवानी कुर्बान,
जहाँ हुए भगत, बिस्मिल और मंगल बलिदान
होता नही कोई पुण्य देश सेवा समान,
इसीलिए है मेरा भारत देश महान
आशिकी
ये जो छलक पड़े आंसू माटी में पड़े दरारों को देखकर,
ये बादलों की जमीं से आशिकी नही तो और क्या है ...
ग़रीबी
इश्क, मोहब्बत, नशा और फितूर...
ये सब अमीरों के चोचले है, गरीबों का कोई रहनुमा नही होता
जिंदगी
अब तो खून से लथपथ खबरें ही आतीं है हर रोज अखबार में,
कितनी सस्ती सी हो गयी है जिंदगी नफरतों के इस बाज़ार में
साथ
नदी के दो छोर आपस में कहाँ मिलते हैं?
गर साथ चलना है, तो थोड़ा फासला रखिये
बेवजह के ख़याल
न जाने कितनी रातें निहारीं है खिड़की से आसमान को,
कि तारें टूट कर आखिर...जाते कहाँ हैं...
हौसला
हैं लाख मुश्किलें राह में तो क्या?
राह तो है ...
है सात समुंदर पार मंजिल तो क्या?
तैरने की चाह तो है...
हार मान लूं किस्मत से ?
ऐसा कोई मेरा दस्तूर नही...
मंजिल से पहले रुक जाऊं?
नही! लक्ष्य से पहले कुछ भी मुझको मंजूर नही













