Monday, 22 October 2018

साहसिक सफ़र

अपने अद्भुद साहस व हौसले से माउंट एवरेस्ट फतह करने वाली प्रथम भारतीय दिव्यांग अरुणिमा सिन्हा जी को समर्पित- 

चलो मुसाफ़िर! एक कहानी लिखतें हैं
इस नये सफ़र की नई रवानी लिखते है 
मुश्किल है सफ़र तो क्या हुआ?
है मानुष कौन जिसको कभी भय न हुआ?

पथरीले राहों का घना अंधेरा
आँखों से तेरे झांक रहा
दूर से ही कठिनाई भाँपकर
भय से थरथर तू काँप रहा
एक पग भी न तुझसे धरा जा रहा
ये कैसी तेरी जवानी है?
रणभेरी सुनकर पीछे हटना
कायरों की निशानी है

तू  आजाद, भगत, बोस की जवानी पढ़
रास्तों की परवाह किये बिना तू आगे बढ़
तू नजरें टिका अर्जुन की भाँति  मछली की आँख पर
दृढ़ता तेरी खुद ले जाएगी मंजिल के द्वार तक 
तू रख हौसला अरुणिमा जैसा
जीवन चक्र में ये विश्राम कैसा
साहस का दामन थामें जो नित आगे बढ़ते हैं
लिए हाँथ में तिरंगा एक पैर से हिमालय चढ़ते हैं

- शिव प्रसाद शुक्ला


Friday, 19 October 2018

MeToo अभियान: बगावत के बोल

शिव प्रसाद शुक्ला 


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                   'यत्र नार्यस्तु पूज्यंते रमंते तत्र देवता:'। यह बात अक्सर सुनने को मिलती है कि जहां स्त्री जाति का आदर-सम्मान होता है, उनकी आवश्यकता और अपेक्षाओं की पूर्ति होती है, वहां देवता गण निवास करते हैं, उस स्थान समाज व परिवार पर देवता गण प्रसन्न रहते हैं। ऐसे उच्च कोटि के विचारों को धारण करने वाला देश, जहां नारियों की पूजा का विधान है, स्त्रियों को देवी तथा भारत को भारत माता कहा जाता है, वहां पर 'मी टू' जैसा कैंपेन यदि चलता है तो निश्चित रूप से उस देश व समाज में रहने वाले लोगों के उच्च कोटि के आदर्शों के पालन पर भी सवाल खड़ा होता है। इस मी टू कैंपेन पर यदि नजर डालें तो हम पाते हैं कि इस आयातित कैंपेन की शुरुआत वर्ष 2006 में हॉलीवुड से की गई थी। अमेरिकी सिविल राइट्स एक्टिविस्ट तराना वर्क ने इसके लिए आवाज उठाया और धीरे-धीरे यह मुहिम अमेरिका में महिलाओं के प्रति कार्यस्थल पर यौन उत्पीड़न के खिलाफ एक जन आंदोलन बना जिसकी चर्चा विश्व स्तर पर हुई। भारत में भी महिलाओं की सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए वर्ष 2013 में "कार्यस्थल पर यौन उत्पीड़न से महिलाओं का संरक्षण (रोकथाम निषेध और निवारण) अधिनियम 2013" बना जिसमें यह प्रावधान किया गया यदि किसी महिला का लैंगिक उत्पीड़न हुआ है तो वह आईपीसी की धारा 354 (अ) के तहत शिकायत दर्ज करवा सकती है जिसमें 5 साल की सजा का भी प्रावधान है।

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                  भारत में 'मी टू' कैंपेन की शुरुआत फ़िल्म अभिनेत्री तनुश्री दत्ता ने की। उन्होंने फ़िल्म अभिनेता और सोशल एक्टिविस्ट नाना पाटेकर के खिलाफ लैंगिक उत्पीड़न जैसा गंभीर आरोप लगाया और यह प्रकरण आग की तरह से फैला जिसकी जद में कई नामी गिरामी हस्तियां भी आ गई। नाना पाटेकर, विकास बहल, आलोक नाथ, सुभाष कपूर, पियूष मिश्रा, चेतन भगत, अभिजीत भट्टाचार्य, कैलाश खेर, साजिद खान, सुभाष घई समेत यहां तक कि पत्रकारिता से राजनीति में आए मोदी सरकार में कैबिनेट मंत्री एमजे अकबर का भी नाम इस मी टू कैंपेन में आया। अब सवाल यह उठता है कि भारत जैसे देश में 'मी टू' कैंपेन के मायने क्या है? इसकी आवश्यकता क्यों पड़ी? और  इसके परिणाम क्या होंगे या हो रहे हैं

                 देवी लक्ष्मी, दुर्गा, सरस्वती, पार्वती, व माता सीता के देश भारत में आए दिन हर रोज महिलाओं से बलात्कार व यौन हिंसा की खबरें आती हैं। प्रतिदिन, प्रति घंटा, प्रति सेकंड कहीं ना कहीं सड़क पर चलती हुई लड़कियों को घूरा जाता है, उन पर फब्तियां कसी जाती हैं। विद्यालय जाती हुई छात्राओं का पीछा किया जाता है। रेल बस में यात्रा कर रही स्त्रियों/लड़कियों/छात्राओं से धक्का-मुक्की व बदसलूकी किया जाता है। यह सब होता है हर रोज खुलेआम और फिर भारत माता का सिर शर्म से झुक जाता है। वास्तव में यह विचारणीय है कि जहां एक तरफ हम स्त्रियों पर आदर्शवाद की बड़ी-बड़ी बातें करते हैं वहीं दूसरी तरफ स्त्रियों को हम भोग व विलासिता का साधन मात्र मानते हैं और उनके साथ घिनौने कृत्य करते हैं। वास्तव में हमारा समाज व देश मानसिक रूप से बीमार होता जा रहा रहा है । वह अपने मूल्यों, संस्कारों व नैतिक कर्तव्यों से दूर होता जा रहा है या यूं कहें तो वह अपने मानसिक पतन की ओर अग्रसर है। 
वर्तमान में भारत वह देश है जहां एक प्रधानमंत्री को बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ का नारा देना पड़ता है, एक मुख्यमंत्री को एंटी रोमियो स्क्वायड टीम का गठन करना पड़ता है और एक बेटी को निर्भया बनना पड़ता है पड़ता है 
लेकिन क्या इन सब के बावजूद देश में महिलाओं को घूरना, उन पर फब्तियां कसना, उनसे बदसलूकी करना बंद हो गया है? नहीं! यह आज भी हो रहा है। इस विकट परिस्थिति में जब तनुश्री दत्ता नाना पाटेकर पर लैंगिक उत्पीड़न का आरोप लगाती हैं तो हमें इस मामले को गंभीरता से लेना चाहिए क्योंकि बॉलीवुड का सच किसी से छुपा नहीं है। पत्रकारों से बात करते हुए कोरियोग्राफर सरोज खान ने ही एक बार कहा था कि 'इंडस्ट्री यदि तन लेती है तो रोटी भी देती है'। तन के बदले रोटी कहां तक उचित है? और फिर भी यदि हम कहते हैं कि 10 साल तक तनुश्री दत्ता चुप क्यों थी तो मुझे नहीं पता कि वह चुप क्यों थी पर अगर अब तनुश्री ने आवाज उठाया है तो हमें उस आवाज को कमजोर नहीं करना चाहिए बल्कि उनके तथ्यों को ध्यान में रखकर कोई राय बनानी चाहिए और निर्णय करना कि कौन सही है या गलत यह अदालत का कार्य है, हमें भारतीय न्याय व्यवस्था में विश्वास रखना होगा।


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                   यदि तनुश्री ने आवाज न उठाया होता तो विकास बहल, नाना पाटेकर, चेतन भगत, साजिद खान, आलोक नाथ, अभिजीत भट्टाचार्य,पीयूष मिश्रा, सुभाष घई, एमजे अकबर सहित कई नामी गिरामी लोगों को जिनको आज भी कई युवा अपना आदर्श मानते हैं, उनके द्वारा किए गए काले करतूतों का कभी पता भी न चलता। आज भी हर रोज लड़कियों/महिलाओं से दुराचार होता है पर उनका 1% ही सच सामने आता है और बाकी 99% मामलों में आवाज ही नहीं होती क्योंकि अभी भी भारत में महिलाओं की स्थिति आवश्यकता के अनुरूप सुधरी नहीं है। उन्हें आज भी देश-काल, समाज एवं परिस्थिति का भय रहता है। सामाजिक लोक लज्जा की भी चिंता ऐसे मामलों में हावी हो जाती है और परिणाम स्वरूप दिन प्रतिदिन महिलाएं अपने ऊपर होते दुराचार के घुटन में घुटती रहती है। लेकिन कब तक ऐसा होता रहेगा? कब तक महिलाएं अपने आवाज को इस घुटन भरे माहौल में दबाती रहेंगी? कब तक महिलाएं अपने आप को अबला मानती रहेंगीं? कहां गया बुराई का समूल नाश करने वाली मां दुर्गा काली का अवतार? कहां गया अपने पति की जान बचाने के लिए माता सावित्री का यमराज से भी लड़ जाने की क्षमता? कहां गया अपने बच्चे को पीठ  पर बांधकर रानी लक्ष्मीबाई का अंग्रेजों से भीड़ जाने का साहस? क्या अब मान लिया जाए की महिलाओं में जोश-जज्बा, साहस और क्षमता नहीं रह गया है? उत्तर है नहीं। स्वतंत्रता आंदोलन से लेकर आजादी के 70 वर्ष बाद भी महिलाओं का एक सुनहरा इतिहास रहा है, उन्होंने नए कीर्तिमान स्थापित किए हैं। पुरुषों के साथ कदम मिलाकर इस देश के न निर्माण में अपनी हम भागीदारी सुनिश्चित की है। वर्तमान में प्रबंधन, शिक्षा, खेल, मीडिया, फ़िल्म एवं राजनीति आदि सभी क्षेत्रों में महिलाओं ने अपनी दमदार उपस्थिति दर्ज करवाई हैं। भारत के वर्तमान सरकार की बात करें मोदी केबिनेट में सुषमा स्वराज, निर्मला सीतारमण, स्मृति इरानी, मेनका गांधी, उमा भारती, अनुप्रिया पटेल, व हरसिमरत कौर बादल के हाथों में देश की बागडोर है। जहां एक तरफ सुषमा स्वराज विदेश मंत्री हैं तो वहीं दूसरी तरफ निर्मला सीतारमण देश की रक्षा मंत्री। तब फिर क्यों महिलाओं को आज के समय में भी अपनी आवाज उठा पाने में साहस की कमी नजर आ रही है?क्यों अपने ऊपर हो रहे दुराचारों के खिलाफ बोलने में सालों लग जा रहे हैं? क्यों आरोपियों को कटघरे में खड़ा करने के लिए किसी मी टू कैंपेन की जरुरत पड़ रही है? महिलाओं को अपने साथ गलत हुए कार्यों के खिलाफ तुरंत अपनी प्रतिक्रिया देनी होगी। उन्हें अपना आवाज बुलंद करना होगा, अपने साथ हो रहे अन्याय के खिलाफ लड़ना होगा। आरोपियों को तुरंत कटघरे में खड़ा करने के लिए साहस जुटाना होगा, रास्ते में पड़ने वाले हर कठिनाइयों से जूझना होगा। महिलाओं को याद रखना होगा कि भारतीय संविधान महिलाओं और पुरुषों में भेदभाव नहीं करता। इसलिए उन्हें अपनी बात कहने के लिए किसी अभियान की जरुरत नहीं महसूस करनी होगी। उन्हें भारतीय संविधान और न्याय व्यवस्था में भरोसा रखना होगा एवं हिम्मत जुटा कर अपने साथ हुए दुराचार का तुरंत बिना किसी अभियान का इंतजार किए प्रतिकार करना होगा। अपनी आवाज उठानी होगी उसके लिए किसी खास मौके या समय का इंतजार करना छोड़ना होगा, क्योंकि खास मौके व समय के अभियानों में बहती हुई गंगा में सब हाथ धोने का बहाना ढूंढते हैं महिलाओं को हमेशा ध्यान में रखना होगा कि  अपने ऊपर हुए दुराचारों का लाभ किसी अन्य उद्देश्य की पूर्ति हेतु किसी और को नहीं लेने देना है, उन्हें तत्काल उसी क्षण अपनी आवाज बुलंद करके आरोपियों को कटघरे में खड़ा करने की पूरी कोशिश करनी होगी, वरना हर अभियानों में एक दूसरे के ऊपर कीचड़ उछालने की भारत में पुरानी परंपरा है।



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          इस देश में बहुतायत लोग ऐसे हैं जो सिर्फ और सिर्फ किसी मौके के तलाश में रहते हैं कि कब उन्हें मौका मिले किसी दूसरे के जिंदगी को इवेंट बना देने का, किसी दूसरे के निजी मामलों को एक अभियान बनाकर अपना मतलब सिद्ध कर लेने का। महिलाओं को यह भी ध्यान रखना होगा कि उनकी सुरक्षा के लिए बने कानूनों का कोई अन्य व्यक्ति या महिला गलत इस्तेमाल या दुरुपयोग न कर पाए वरना महिलाओं व पुरुषों के बीच की सामाजिक खाई और बढ़ेगी।  इसीलिए मैं फिर कहता हूं, हे भारत की महिलाओं! अपने आप को पहचानो! खुद पर भरोसा रखो! क्योंकि अब समय आ गया है बदलाव का। अपने पराक्रम और साहस भरे इतिहास से प्रेरणा लो! अपनी आवाज बुलंद करो! तुम्हें किसी अभियान की आवश्यकता नहीं है, तुम स्वयं में शक्ति स्वरूपा हो।

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साहसिक सफ़र

अपने अद्भुद साहस व हौसले से माउंट एवरेस्ट फतह करने वाली प्रथम भारतीय दिव्यांग अरुणिमा सिन्हा जी को समर्पित-  चलो मुसाफ़िर! एक कहानी ल...